Not known Facts About Subconscious Mind




इब्राहीम आधी रात में अपने महल में सो रहा था। सिपही कोठे पर पहरा दे रहे थे। बादशाह का यह उद्देश्य नहीं था कि सिपाहियों की सहायता से चोरों और दुष्ट मनुष्यों से बचा रहे, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि जो बादशाह न्यायप्रिय है, उसपर कोई विपत्ति नहीं आ सकती, वह तो ईश्वर से साक्षात्कार करना चाहता था।

हजरत रसूल ने बीमार से कहा, "तू खुदा से दुआ कर कि वह तेरी कठिनाइयों को आसान करे। ऐ खुदा!

एक राजा था। उसके एक नौजवान लड़का था। लड़का बड़ा सुंदर था। राज ने एक दिन स्वप्न में देखा कि लड़का मर गया। इकलौता बेटा, फिर सुन्दर और होनहार। राजा खूब रोया और सिर धुनने लगा। इतने में उसकी निद्रा भंग हो गयी। जागा तो सब भ्रम था। लड़का बड़े आनंद में था। पुत्र के जन्म पर जो खुशी हुई थी, अब उसके मरकर जीने पर उससे अधिक खुशी हुई।

मूसा ने कहां, "इस विचार को छोड़ दे, क्योंकि इसमें तरह-तहर के खतरे हैं। पुस्तकों और वाणियों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के बजाय ईश्वर से ही प्रार्थना कर कि वह तेरे ज्ञान-चक्षु खोल दे।" परन्तु जितना हजरत मूसा ने उससे माना किया, उतनी ही उसकी इच्छा प्रबल होती गयी। इस आदमी ने निवेदन किया, "जबसे आपको दिव्य ज्योति प्राप्त हुई है, किसी वस्तु का भेद बिना प्रकट हुए नहीं रहा है। किसी को निराश करना आपके दयालु स्वाभाव के विपरीत है। आप ईश्चर के प्रतिनिधि हैं। यदि मुझे इस विद्या के प्राप्त करने से रोकते हैं तो मुझे बड़ा दु:ख होगा।"

इस महान ग्रंथ में कथाओं और उपाख्यानों द्वारा भक्ति, वैराग्य अध्यात्म, नीति आदि के उपदेश दिये गए हैं और कहने का click here ढंग get more info ऐसा हृदयहारी और चमत्कारपूर्ण है कि कैसा ही शुष्क व्यक्ति क्यों न हो, उसपर भी प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। प्रत्येक कथा के अन्त में ऐसा सुन्दर परिणाम निकाला गया है कि पढ़नेवाला मुग्ध हो जाता है।

ईंट की दीवार / जलालुद्दीन रूमी (विकिपीडिया)

एक नदी के किनारे पर ऊंची दीवार थी। उसपर एक प्यासा आदमी बैठा हुआ था। बिना पानी के उसके प्राण निकले जा रहे थे। दीवार पानी तक पहुंचने में रुकावट डालती थी और वह प्यास के मारे व्याकुल हो रहा था। उसने दीवार की एक ईंट उखाड़कर पानी में जो फेंकी तो पानी की आवाज कान में आयी। वह आवाज भी उसे ऐसी प्यारी लगी, जैसे प्रेमपात्र की आवाज होती है। इसी एक आवाज ने शराब की सी मस्ती पैदा कर दी।

सुननेवाले खूब हंसे कि लो साहब, यह तोता साधु को भी अपने समान समझता है।

सूफी ने जी में कहा, "जो कुछ मेरे साथ होनी थी, वह तो हो चुकी; परन्तु मेरे साथियो! जरा अपनी खबर लो। तुमने मुझको पराया समझा, हालांकि मैं इस दुष्ट माली से ज्यादा पराया न था। जो कुछ मैंने खाया है, वही तुम्हें भी खाना है और सच बात तो यह है कि धूर्तों को ऐसा दण्ड मिलना चाहिए।"

[मन उस दुराचारिणी स्त्री के समान है, जिससे सारा वातावरण दूषित हो रहा है। अत: उसको मारना चाहिए, अर्थात् वश में करना चाहिए, क्योंकि इस दुष्ट के कारण हर घड़ी किसी न किसीसे लड़ाई होने का अंदेशा है। मन की वासनाओं के कारण यह सुखमय संसार दु:खदायी बना हुआ है। यदि मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया जाये तो दु:ख और सुख पास न आयें और सारा संसार मित्र बनकर रहे।] १

"मियां, जरा खुरेरा भी फिर देना, और ठंड का मौसम है खच्चर की पीठ पर झूल भी डाल देना।"

तुमने ऐसी क्या बात देखी कि मुझपर अधिकार प्राप्त करने के बाद भी मुकाबले से हट गये।"

लिए,अब तो गूंजते हैं नारे तालिबान के लिए...हिन्दू

लोभ से आया था, परन्तु जब यहां पहुंचा तो इसके दर्शनों के लिए उत्कण्ठित हो गया।" फिर पानी की मशक देकर कहा, "इस नजराने को सुलतान की सेवा में पहुंचाओ और निवेदन करो कि मेरी यह तुच्छ भेंट किसी मतलब के लिए नहीं है। यह भी अर्ज करना कि यह मीठा पानी सौंधी मिट्टी के घड़े का है, जिसमें बरसाती पानी इकट्ठा किया गया था।"

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